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शुक्रवार, 24 जून 2016

रामदेव या अन्ना!


प्रश्न ये है की रामदेव और अन्ना दोनों ही एक अच्छे उदेश्य के लिए आन्दोलन कर रहे है! लेकिन दोनों की ही राहे एक दुसरे जे जुदा या अलग क्यों है! जन्हा सुरु मे बाबा रामदेव ने अन्ना का साथ दिया वन्ही अन्ना ने पहले ही दिन से बाबा के आन्दोलन से दूरी बना ली! क्योंकि उनके मंच पर कुछ सांप्रदायिक लोग पहुँच गए! जबकि बाबा के मंच पर ऐसे भी लोग थे जो एक अच्छे उदेश्य के लिए इकट्ठा हुए थे! और स्वतंत्र भारत मे सभी को अपनी राय देना का हक है चाहे वो धार्मिक हो या राजनातिक हो! आप किसी भी व्यक्ति की बहिस्कार इसलिए नहीं कर सकते की वो धार्मिक है या राजनातिक है! एक ही विषय पर एक ही संगठन के लोगो की बातें या उनके विचार अलग हो सकते है लेकिन इसका मतलब ये नहीं है की संगठन को समाप्त ही कर दिया जाये.

अब बात करते है असली मुद्दों की, की रामदेव या अन्ना के आन्दोलन मे सबसे ज्यादा असरदार आन्दोलन किसका है!

१. रामदेव बात करते है काले धन पर, भ्रस्टाचार पर, स्वदेशी पर, स्व-रोजगार पर. जबकि अन्ना बात करते है सिर्फ भ्रस्टाचार पर.
     क्या भ्रस्टाचार को समाप्त करने से ये सभी समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी, नहीं होंगी क्योंकि सिर्फ भ्रस्टाचार हटाने से गरीबी दूर नहीं होगी.

२. रामदेव ने अपनी बात जो की आन्दोलन से जुडी हुई है देश के उस कोने तक पहुंचाई है जन्हा देश की आत्मा बस्ती है यानि की गाँव तक, जबकि अन्ना के आन्दोलन से जुड़ा हुआ है सिर्फ और सिर्फ सहरी व्यक्ति जो सिर्फ कभी-कभी इस भ्रस्ट तंत्र की चपेट मे आता है, जबकि ग्रामीण व्यक्ति हर रोज भ्रस्टाचार से आमना -सामना करता है.
  क्या भ्रस्टाचार को समाप्त करने से गाँवो का विकास हो सकता है! नहीं होगा क्योंकि इतने घोटाले करके जो पैसा विदेशो मे भेज दिया अगर वो देश मे आये तो कुछ हो सकता है!

३. अन्ना सिर्फ बात करते है भ्रस्टाचार पर रोक की लेकिन जो पैसा भ्रस्टाचार करके विदेशो मे भेज दिया क्या वो देश का नहीं है! क्या उस पर हम जैसे करोडो कर देने  वालो का कोई हक नहीं है! रामदेव इसी पैसे की वापस लाकर इससे विकास करने की बात करते है और यही एक गलत बात है जो वो करते है क्योंकि सरकार ये नहीं चाहती की वो पैसा वापस आये.
   क्या विकास कोई बुरी बात है क्या ये अच्छा नहीं होगा की हमारे देश मे कोई गरीब नहीं होगा! कोई व्यक्ति रात की भूखा नहीं सोयेगा! हमारे देश के नन्हे बच्चो को मजदूरी नहीं करनी पड़ेगी.

४. किसी भी आन्दोलन को किसी धार्मिक संगठन के समर्थन दे देने से ये साबित नहीं हो सकता की वो आन्दोलन समाप्त हो जायेगा! हमारी आत्मा हमारे संस्कारो मे बस्ती है और अगर हम अपने संस्कारो को अच्छे से निर्वाह करे तो इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की कोण समर्थन दे रहा है और कोण नहीं!
      अन्ना अपने मंच से हिन्दू धार्मिक लोगो को भगा देते है भारत माता का चित्र हटा देते है और अपने मंच पर स्वागत करते है देश के विभाजन करने की बात करने वालो को, स्वागत करते है मओवादियो का समर्थन करने वालो का, समर्थन करते है एक धर्म विशेस को गलियां देने वाले लोगो को, अगर अन्ना को अपने आन्दोलन के लिए किसी की जरुरत ही नहीं थी खासकर हिंदूवादी सोच वालो के लिए तो फिर क्यों उन्होंने उन अधर्मियों की मंच पर जगह दी जो सिर्फ देश को बटने के कार्य करते है.

जबकि रामदेव ने सभी का आह्वान किया अपने आन्दोलन मे, सभी को सामिल किया किसी से जाती या धर्म नहीं पुछा गया, सिर्फ सहयोग माँगा गया उस आन्दोलन मे जो असलियत मे भारत की तस्वीर बदल देगा, बना देगा फिर से भारत को सोने की चिड़िया!

मे व्यक्तिगत तौर पर न बाबा का समर्थक हूँ न अन्ना का विरोधी! लेकिन अगर बात मुद्दों की की जाये तो बाबा रामदेव के आन्दोलन मे वो आग थी जिससे सरकार को खुद एहसास हुआ की ये आग उसे जला देगी! इसीलिए ४-४ मंत्री पहले अगवानी करते है फिर लाखो लोगो को रात को पिटवाते है! ये सिर्फ यही कहता है की सरकार को अगर डर है तो सिर्फ रामदेव के आन्दोलन से. अन्ना के आन्दोलन से कुछ फर्क नहीं पड़ता जिसके उद्हरण आप लोग देख ही चुके है संसद मे पेश सरकार की विधेयक और सरकार की मानसिकता आप देख चुके है आप की किस तरह से बाबा की परेशान किया जा रहा है हर रोज एक नया आरोप लगा दिया जाता है. अगर आप सोचते है की बाबा के पास इतनी दौलत है तो मे यही कहूँगा की बाबा ने इतनी इच्छा-शक्ति तो दिखाई की उन्होंने अपनी सम्पति को उजागर किया! क्या सरकार मे बैठे भ्रस्ट लोगो मे इतनी इच्छा-सकती है!

मेरी दुआ है की बाबा और अन्ना जी एक मंच पर आये और इस भ्रस्ट तंत्र और इस भ्रस्ट सरकार से लोगो को निजात दिलाये. मे इस आन्दोलन मे बाबा और अन्ना के साथ हूँ.

जय हिंद.



आरएसएस?

जो लोग आरएसएस को ज्वाइन करने के लिए कहने भर से ऐसे दिखावा करते है की जैसे आरएसएस आरएसएस ना होकर isis हो। वही लोग आरएसएस को उसके हर काम पर इस तरह ज्ञान और अकड़ पेलते है जैसे की आरएसएस इनके टुकड़ो पर पल रही हो।

जब भी देश में कोई आपदा आये आरएसएस सहायता करे। कंही को दंगा हो आरएसएस क्या कर रही है क्यों नहीं आती।
लेकिन जब आरएसएस को ज्वाइन करने को कहो तो वही सब पतली गली पकड़ लेते है। क्यों भाई कोई और क्यों लड़े तुम्हारे लिए। तुम खुद क्यों ना दुसरो का लिए लड़ो।

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

राहुल गाँधी या लाल-कृष्ण अडवाणी?


राजनीती में किसका कितना योगदान है ये उस के उसकी पार्टी में किसी बड़े पद पर होने से नहीं आंका जा सकता! नेता वो होता है जिसने अपने किसी विचार से लोगो को प्रभावित किया हो! भीड़ सिर्फ लोगो का जमावड़ा होती है जिसका किसी आन्दोलन या किसी विचार से कोई लेना देना नहीं होता जबकि समर्थको मे अपने नेता के विचार या आन्दोलन को आगे बढ़ाने में योगदान होता है! भीड़ जुटाने से कोई नेता नहीं बन जाता है! नेता वही होता है जो अपने बातो से अपने समर्थको की संख्या बढ़ाये न की भीड़ बढ़ाये!

अब बात करते है की राहुल या अडवाणी ने देश की राजनीती को क्या दिया है! राहुल की बात करें तो आजतक उन्होंने देश के लिए भगवा आतंकवाद का खतरा बताकर समाज को बाटने के अलावा कुछ नहीं किया है! अगर व्यक्तिगत तोर  पर बात करें तो राहुल गाँधी ने आजतक इस देश के लिए कुछ नहीं किया! उन्हें पार्टी में जो पद मिला है वो उनके किसी योगदान से नहीं बल्कि एक खास परिवार की सदस्य होने के कारन मिला है! गरीबो के साथ फोटो खिचाने या गरीबो के घर खाना खाने से ये साबित नहीं होता की आप ने देश के राजनीती मे कुछ खास किया है! देश से गरीबी मिटाने की बात  करने वाले राहुल ने आजतक अपने संसदीये छेत्र अमेठी के गरीबो के लिए कुछ नहीं किया जबकि केंद्रे मे पिछले ६५ वर्षो मे से ५८ वर्षो तक कांग्रेस की ही सरकार रही है! खुद को गरीबो और किसानो का नेता कहने वाले राहुल ने आजतक गरबो या किसानो के घर पर खाना खाने के अलावा अगर कुछ किया है तो गरीबो और किसानो का मजाक ही उड़ाया है! राहुल गाँधी  को राजनीती विरासत मे मिली है! यानि की बिना कुछ किये सीधे प्रधानमंत्री की रेस मे सामिल हो चुके है! क्या ये देश के लिए इससे बड़ा भी कोई मजाक होगा! 

अगर बात करें अडवानी की तो उन्होंने अपनी राजनीती की सुरुआत वंहा से की है जन्हा पर कोई नेता नहीं कहा जाता एक कार्यकर्ता कहा जाता है! अगर किसी ने कांग्रेस का विकल्प बनाया है तो वो सिर्फ अडवाणी जी ही है! एक ऐसे समय मे लोगो को एक अच्छा विकल्प दिया जब कांग्रेस के अलावा देश मे कोई दूसरी पार्टी थी ही नहीं या जो थी भी तो वो सिर्फ दिखावा भर थी! अगर आज कांग्रेस घुटने के बल चलने को मजबूर है तो सिर्फ अडवाणी जी की वजह से! आज अगर एक मजबूत विपक्ष है तो सिर्फ अडवाणी जी की दूरदर्शी सोच के कारन, एक ऐसी पार्टी जिसका कोई जनाधार नहीं था लोगो को सिर्फ कांग्रेस और सिर्फ उसके नेता ही नजर आते थे उसको देश के सत्ता तक पहुँचाया! लोगो मे एक उम्मीद की एक रौशनी दिखाई सिर्फ अडवाणी जी ने!

अपने जीवन के लगभग ६० साल इस देश की राजनीती को देने से अगर वो प्रधानमंत्री के पद के लिए उपयुक्त है तो इसमें कोई गलत भी नहीं है! अगर राहुल सिर्फ एक परिवार विषेस के होने के कारन प्रधानमंत्री की दौड़ मे शामिल हो सकते है तो जिसने इतने वर्षो तक एक भ्रस्ट पार्टी से लड़कर एक आशा के किरण जगाई है तो उसके रस्ते मे रुकावट कैसे, क्या राहुल अडवाणी से ज्यादा काबिल है अगर है तो साबित करके दिखाये!


कांग्रेस हटाओ देश बचाओ!

बुधवार, 10 अगस्त 2011

रामदेव या अन्ना!

प्रश्न ये है की रामदेव और अन्ना दोनों ही एक अच्छे उदेश्य के लिए आन्दोलन कर रहे है! लेकिन दोनों की ही राहे एक दुसरे जे जुदा या अलग क्यों है! जन्हा सुरु मे बाबा रामदेव ने अन्ना का साथ दिया वन्ही अन्ना ने पहले ही दिन से बाबा के आन्दोलन से दूरी बना ली! क्योंकि उनके मंच पर कुछ सांप्रदायिक लोग पहुँच गए! जबकि बाबा के मंच पर ऐसे भी लोग थे जो एक अच्छे उदेश्य के लिए इकट्ठा हुए थे! और स्वतंत्र भारत मे सभी को अपनी राय देना का हक है चाहे वो धार्मिक हो या राजनातिक हो! आप किसी भी व्यक्ति की बहिस्कार इसलिए नहीं कर सकते की वो धार्मिक है या राजनातिक है! एक ही विषय पर एक ही संगठन के लोगो की बातें या उनके विचार अलग हो सकते है लेकिन इसका मतलब ये नहीं है की संगठन को समाप्त ही कर दिया जाये.

अब बात करते है असली मुद्दों की, की रामदेव या अन्ना के आन्दोलन मे सबसे ज्यादा असरदार आन्दोलन किसका है!

१. रामदेव बात करते है काले धन पर, भ्रस्टाचार पर, स्वदेशी पर, स्व-रोजगार पर. जबकि अन्ना बात करते है सिर्फ भ्रस्टाचार पर.
     क्या भ्रस्टाचार को समाप्त करने से ये सभी समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी, नहीं होंगी क्योंकि सिर्फ भ्रस्टाचार हटाने से गरीबी दूर नहीं होगी.

२. रामदेव ने अपनी बात जो की आन्दोलन से जुडी हुई है देश के उस कोने तक पहुंचाई है जन्हा देश की आत्मा बस्ती है यानि की गाँव तक, जबकि अन्ना के आन्दोलन से जुड़ा हुआ है सिर्फ और सिर्फ सहरी व्यक्ति जो सिर्फ कभी-कभी इस भ्रस्ट तंत्र की चपेट मे आता है, जबकि ग्रामीण व्यक्ति हर रोज भ्रस्टाचार से आमना -सामना करता है.
  क्या भ्रस्टाचार को समाप्त करने से गाँवो का विकास हो सकता है! नहीं होगा क्योंकि इतने घोटाले करके जो पैसा विदेशो मे भेज दिया अगर वो देश मे आये तो कुछ हो सकता है!

३. अन्ना सिर्फ बात करते है भ्रस्टाचार पर रोक की लेकिन जो पैसा भ्रस्टाचार करके विदेशो मे भेज दिया क्या वो देश का नहीं है! क्या उस पर हम जैसे करोडो कर देने  वालो का कोई हक नहीं है! रामदेव इसी पैसे की वापस लाकर इससे विकास करने की बात करते है और यही एक गलत बात है जो वो करते है क्योंकि सरकार ये नहीं चाहती की वो पैसा वापस आये.
   क्या विकास कोई बुरी बात है क्या ये अच्छा नहीं होगा की हमारे देश मे कोई गरीब नहीं होगा! कोई व्यक्ति रात की भूखा नहीं सोयेगा! हमारे देश के नन्हे बच्चो को मजदूरी नहीं करनी पड़ेगी.

४. किसी भी आन्दोलन को किसी धार्मिक संगठन के समर्थन दे देने से ये साबित नहीं हो सकता की वो आन्दोलन समाप्त हो जायेगा! हमारी आत्मा हमारे संस्कारो मे बस्ती है और अगर हम अपने संस्कारो को अच्छे से निर्वाह करे तो इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की कोण समर्थन दे रहा है और कोण नहीं!
      अन्ना अपने मंच से हिन्दू धार्मिक लोगो को भगा देते है भारत माता का चित्र हटा देते है और अपने मंच पर स्वागत करते है देश के विभाजन करने की बात करने वालो को, स्वागत करते है मओवादियो का समर्थन करने वालो का, समर्थन करते है एक धर्म विशेस को गलियां देने वाले लोगो को, अगर अन्ना को अपने आन्दोलन के लिए किसी की जरुरत ही नहीं थी खासकर हिंदूवादी सोच वालो के लिए तो फिर क्यों उन्होंने उन अधर्मियों की मंच पर जगह दी जो सिर्फ देश को बटने के कार्य करते है.

जबकि रामदेव ने सभी का आह्वान किया अपने आन्दोलन मे, सभी को सामिल किया किसी से जाती या धर्म नहीं पुछा गया, सिर्फ सहयोग माँगा गया उस आन्दोलन मे जो असलियत मे भारत की तस्वीर बदल देगा, बना देगा फिर से भारत को सोने की चिड़िया!

मे व्यक्तिगत तौर पर न बाबा का समर्थक हूँ न अन्ना का विरोधी! लेकिन अगर बात मुद्दों की की जाये तो बाबा रामदेव के आन्दोलन मे वो आग थी जिससे सरकार को खुद एहसास हुआ की ये आग उसे जला देगी! इसीलिए ४-४ मंत्री पहले अगवानी करते है फिर लाखो लोगो को रात को पिटवाते है! ये सिर्फ यही कहता है की सरकार को अगर डर है तो सिर्फ रामदेव के आन्दोलन से. अन्ना के आन्दोलन से कुछ फर्क नहीं पड़ता जिसके उद्हरण आप लोग देख ही चुके है संसद मे पेश सरकार की विधेयक और सरकार की मानसिकता आप देख चुके है आप की किस तरह से बाबा की परेशान किया जा रहा है हर रोज एक नया आरोप लगा दिया जाता है. अगर आप सोचते है की बाबा के पास इतनी दौलत है तो मे यही कहूँगा की बाबा ने इतनी इच्छा-शक्ति तो दिखाई की उन्होंने अपनी सम्पति को उजागर किया! क्या सरकार मे बैठे भ्रस्ट लोगो मे इतनी इच्छा-सकती है!

मेरी दुआ है की बाबा और अन्ना जी एक मंच पर आये और इस भ्रस्ट तंत्र और इस भ्रस्ट सरकार से लोगो को निजात दिलाये. मे इस आन्दोलन मे बाबा और अन्ना के साथ हूँ.

जय हिंद.



शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

आरक्षण अभिशाप या वरदान?

सबसे पहला सवाल यही है की आरक्षण ने इस देश की कितना भला किया है, क्या मिला है हमे इस आरक्षण से! सायद सभी का जवाब होगा भेदभाव, जाती-पात, वर्ण भेद इत्यादि! आरक्षण ने समाज को सिर्फ और सिर्फ बाटने  का काम किया है! जो इस आरक्षण से लाभान्वित हुए है वो जरुर इस से सहमत होंगे की आरक्षण मिलना चाहिए, जिन्हें लाभ नहीं मिला वो कहते है की आरक्षण नहीं मिलना चाहिए! आरक्षण ने जातियों मे असमानताएं ही पैदा की है! आरक्षण का फायदा जाती विशेष को न होकर के जाती के अंदर पहले से व्यवस्थित लोगो को ही हुआ है! आरक्षित जाती के कितने लोगो को फायदा हुआ क्या आजतक किसी सरकार ने जनता या उस जाती को बताया है! आज भी आरक्षित जातियों के अंदर आर्थिक विषमतायें मोजूद है! कंही-कंही तो एक ही परिवार के सभी सदस्य सरकारी या गैर-सरकारी संस्थानों मे नौकरी कर रहे है और दूसरी तरफ एक ही परिवार के सभी सदस्य बेरोजगार है! क्या ये आर्थिक विषमतायें उचित है!

इन आर्थिक विषमताओ की उचित नहीं कहा जा सकता क्योंकि अभी तक की सभी सरकारों ने इस मुद्दे की राजनीतिकरण की किया है! सभी राजनातिक दलो ने आरक्षण का राजनेतिक फायदा ही उठाया है! सिर्फ और सिर्फ समाज जो पहले से ही जातियों मे बटा पड़ा है उसे और बटने का ही कार्य किया है!

आरक्षण की अगर सच्चा और सही फायदा कमजोर और गरीब तबके को देना है तो आरक्षण को जाती-विशेष न देकर के आर्थिक रूप से कमजोर लोगो को देना चाहिए! आज आरक्षण से हर छेत्र पिछड़ा हुआ है वो सभी लोग जो उस पद के लिए काबिल नहीं भी है लेकिन आरक्षण की आड़ मे जगह पा जाते है चाहे वो नौकरी हो या फिर शिक्षा! आज भी हर जाती मे गरीब भरे पड़े है सहरो की अपेक्षा गांवो के हालत और भी ख़राब है! वंहा गरीब आज भी गरीब ही है चाहे वो पिछड़ी जाती से हो या स्वर्ण जाती से! गरीब गरीब होता है न की जाती अगड़ी या पिछड़ी होने से उसे कोई फायदा होगा!

आरक्षण अगर देना है तो आर्थिक रूप से पिछड़े लोगो को दो उन्हें मत दो जो आज इतने आगे बढ़ चुके है की अगर उन्हें आरक्षण न देने से वो कुछ कर ही नहीं पाएंगे! आरक्षण जरुरी है लेकिन सिर्फ और सिर्फ आर्थिक रूप से पिछड़े हुए लोगो को या फिर शारीरिक रूप से कमजोर लोगो को!

आरक्षण हटायें देश बचाएं!

गुरुवार, 4 अगस्त 2011

अब कन्हा है भट्टा-पारसोल का युवराज!

उत्तर-प्रदेश के गाँव की गलियों मे न्यूज़-चैनल की बारात लेकर पैदल घुमने वाला भारत का स्व-घोषित युवराज हरियाणा मे अपने ट्रस्ट के लिए अरबो रुप्येओ की किसानो की लुटी गयी जमीन पर चुप बैठा है! क्यों क्योंकि उसे किसानो की दर्द सिर्फ उत्तर-प्रदेश मे नजर आया! वंहा पर नहीं आया जन्हा पर खुद लूट रहे है किसानो को! क्योंकि कोई और लुटे तो बोलता है हमें शर्म आती है अपने आप को भारतीय कहते हुए! खुद लुटे तो कहो भारत चमक रहा है! भारत तरक्की कर रहा है!

मतलब साफ़ है या तो देश को सिर्फ ये लूटेंगे और अगर कोई और लूटेगा तो या तो हिस्सा दो नहीं तो मीडिया की बारात लेकर आपके घर आयेंगे और पुरे संसार को बताएँगे की हमे खुद को भारतीय कहने पर शर्म आती है क्योंकि हमे लूट मे हमारा हिस्सा नहीं मिला है!

युवराज को शर्म आती है पुलिस के लाठी-चार्ज पर अगर उसे किसी और सरकार ने करवाया हो! वो भी तब जब कानून टूटने की समस्या हो, लेकिन तब शर्म नहीं आती जब उनकी अपनी सरकार सोते हुए हजारो लोगो को रातो को पिटवाती है! उसमे कैसे सरम वो तो जरूरी वरना लोगो को पता कैसे चलेगा की जो हमसे टकराएगा हमे सही गलत समझाएगा उसका यही हस्र होगा!

सोते हुए लोग, बच्चे, औरते, बुजुर्ग सभी रात को पुलिस दुआरा पिटे जाते है और हमारे स्व-घोषित युवराज छुट्टी मनाने इटली और स्वित्ज़रलैंड की यात्रा पर चले जाते है! तब इन्हें शर्म नहीं गर्व होता है देखो हमने कैसे दिल्ली  से लाखो लोगो को रातो रात खदेड़ दिया!

धन्य है भारत की जनता जो मार खा कर भी इन जैसे लोगो को सर पर बिठाती है! अभी भी समय है इस नींद से जगा जाये और इस भ्रस्ट सरकार को हटाया जाये!

कांग्रेस हटाओ देश बचाओ!

बुधवार, 3 अगस्त 2011

"कांग्रेस से नाता तोड़ो भारत जोड़ो"

"क्या एक ऐसे इंसान को देश का प्रधानमंत्री बनाया जायेगा जिसे देश के बारे मे ये भी पता नहीं है की शर्म किस बात पर करे और किस पर नहीं करे! जिसकी परवरिश इटली मे हुई हो जिसकी पढाई इंग्लैंड और इटली मे हुई हो क्या वो भारत को समझ सकता है! नहीं समझ... सकता क्योंकि उसे भारत से नहीं भारत से मिलने वाली दौलत से मतलब है! उसे भारत को लुटने से मतलब है! लूटो जितना लूटना है! वैसे भी हिन्दू तो हुआ भी ह तो लुटने के लिये! ८०० साल मुगलों ने लुटा २०० साल अंग्रेजो ने लुटा! जिसे अगर बचा भी लिया मंदिरों मे छुपा कर तो उसे अब ये सेकुलर कहने वाली सरकार जो की कभी हो ही नहीं सकती सेकुलर वो लूट लेगी, जिसमे साथ देह रहे है ये विदेशो मे पढ़े लिखे कहने को युवा पर क्या ये है युवा! कभी इन्होने सीमा पर जाकर के देखा है की कैसे हमारे जवान सिर्फ और सिर्फ इन्हें बचा रहे है खुद सहीद होकर!"
"कांग्रेस से नाता तोड़ो भारत जोड़ो"